मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

ग्रामीणों ने चुनाव की फिजूलखर्ची रोकी

खुद ही चुनाव करा निर्विरोध चुना सरपंच


राजेश सिंह क्षत्री



छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के बम्हनीडीह विकासखण्ड के बोरसी पंचायत में ग्रामीणों ने अनूठी पहल पर अपने सरपंच और पंचों का चुनाव घोषित तारीख से पहले ही करा लिया और चुनाव का संचालन खुद कर सरकार की फिजूलखर्ची रोक दी। यह अनोखी पहल कर कम पढ़े-लिखे लोगों ने चुनाव खर्च के नाम पर पैसे बहाने वाले तंत्र को आईना दिखाया है। 

8 जनवरी को नामांकन का आखिरी दिन था। 9 जनवरी को नामांकन वापसी की तारीख थी और 10 जनवरी को उम्मीदवारों को चुनाव चिन्हों का आवंटन कर दिया गया। पंचायत चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज थी। पंच-सरपंच के लिए दावेदारों ने नामांकन जमा कर दिए थे इसी बीच गांव की सरकार चुनने की बात आई तो गांव में हवा की दिशा ही बदल गई तथा गांव के बुजुर्गो ने 7 जनवरी को आपसी सलाह मशवरा करके ग्राम के बैगा चैक में बैठक के लिए मुनादी करा दी। बैठक में सभी लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया जहां गांव के लोगों ने एक साहसिक कदम उठाते हुए मतदान से पहले ही गांव में मतदान कराने का निर्णय लेते हुए शपथपत्र तैयार किया और मतदाताओं ने हस्ताक्षर कर मतदान की तारीख नाम वापसी के ठीक एक दिन पहले 9 जनवरी तय की। 9 जनवरी को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक ग्राम के ही स्कूल में मतदान कराया गया। जिसमें बोरसी के कुल 1013 मतदाताओं में से 855 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। जिसके बाद हुए मतगणना में श्रीमती चंपादेवी रोहित चंद्रा को 628 और श्रीमती शांति चंद्रा को 401 मत प्राप्त हुए। इसी प्रकार सभी 13 वार्ड पंच का परीणाम भी घोषित किया गया। इस तरह बोरसी ग्राम पंचायत के ग्रामीणों ने आपसी भाईचारा का अनूठा मिसाल पेश करते हुए तारीख से पहले ही सरपंच और पंचों का चुनाव कर लिया। सारी चुनाव प्रक्रिया पारदर्शिता के साथ पूरी की गई, इसलिए किसी ने इस पर आपत्ति नहीं उठाई। जनपद पंचायत बम्हनीडीह के सीईओ एम.एल. महादेवा ने बताया कि बोरसी पंचायत में अब सरपंच और सभी पंच निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए तथा यहां चुनाव कराने की जरूरत नहीं रह गई क्योंकि उसके बाद जीतने वाले उम्मीद्वार ही चुनाव मैदान में शेष बचे तथा शेष उम्मीद्वारों ने अपने नाम वापस ले लिए। ऐसा करने से शासन को यहां पर पंच और सरपंच चुनाव कराने की जरूरत नहीं पड़ी वहीं प्रत्याशियों के चुनाव में होने वाले खर्च भी बच गए।

विकास के लिए समर्पित रहूंगी - श्रीमती चंद्रा

नवनिर्वाचित सरपंच श्रीमती चंपादेवी चन्द्रा ने पंचायत की मुस्कान से बातचीत करते हुए कहा कि जिस विश्वास के साथ यहां के जागरूक मतदाताओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने एक अनूठी पहल करते हुए मतदान से पहले ही चुनाव कराया और मुझे विजयी बनाया इस पर मैं खरा उतरने का प्रयास करूंगी, साथ ही गांव के विकास के लिए सदैव सेवा भावना के साथ कार्य करना मेरी पहली प्राथमिकता होगी।

मध्यप्रदेश का एक गांव जहां सरपंच पद के लिए लगती है बोली

ढाबला महेश में रामद्वारा निर्माण में लगाते हैं राशि

राजेश सिंह क्षत्री



‘‘आठ लाख एक, आठ लाख दो, आठ लाख तीन ...। सरपंच पद के लिए सबसे ज्यादा आठ लाख की बोली दुलेसिंह ने लगाई है इसलिए पांच साल के लिए हम दुलेसिंह को गांव का सरपंच बनाते हैं। दुलेसिंह आठ लाख दे और सरपंच का पद अपने साथ अपने घर ले जाए।’’ क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि सरपंच का चुनाव इस तरह से भी हो सकता है। शायद इस बात की आपको कल्पना भी नहीं होगी लेकिन ऐसा हकीकत में होता है। वो भी आपके पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के एक गांव में। इस गांव में सरपंच और उपसरपंच पद के लिए बकायदा बोली लगती है तथा इस बोली में गांव के सभी लोग शामिल होते हैं और जिसकी बोली सबसे ज्यादा रहती है उसे ही सरपंच का पद दे दिया जाता है। गांव के लोग बोली से प्राप्त राशि को रामद्वारा निर्माण में लगाते हैं वहीं सरपंच चुनाव लड़ने के शौकीनों को भी लगता है कि लाखों रूपए खर्च करने के बाद चुनाव में हारने से तो अच्छा है कि बोली में भाग लेकर अपनी किस्मत आजमा ली जाए। क्योंकि यहां रकम गंवाने की जोखिम जो नहीं रहती। 

देश का हृदय स्थल माने जाने वाले मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले का एक गांव। गांव के चैपाल में सारे ग्रामवासी जमा है। इस गांव के लोगों के लिए आज का दिन खास है क्योंकि आज इस गांव में बोली लगनी है। यह बोली इस मायने में भी खास है कि बोली सरपंच के पद के लिए लगने वाली है। गांव के बाहर के लोगों के लिए इस चैपाल की गतिविधियां उत्सुकता का विषय हो सकती है लेकिन गांव के लोगों के लिए तो यह सामान्य सी बात है क्योंकि यहां इससे पहले भी दो बार ऐसी ही चैपाल आयोजित की जा चुकी है तथा इससे पहले भी दो बार ऐसी ही बोली के माध्यम से उनके गांव का मुखिया चुना जा चुका है। इस गांव में पहली बार 2005 में सरपंच पद के लिए बोली लगाए जाने की शुरूआत हुई थी तब गांव के बद्रीसिंह गोकुल सिंह ने सबसे ज्यादा 75 हजार रूपए की बोली लगाई थी और वो सरपंच चुने गए थे। तब इस गांव के लोगों को बहुत ज्यादा इसके बारे में पता नहीं था, इसलिए बोली की राशि कम लगी थी। लेकिन उसके पांच साल बात जब पंचायत चुनाव हुए तब एक बार फिर से इसी चैपाल पर सारे ग्रामवासी इकट्ठा हुए और बोली लगी तो यह आंकड़ा लगभग पांच गुना ज्यादा बढ़ गया और साढ़े तीन लाख रूपए में बोली समाप्त हुई। अब उस घटना को भी पांच साल हो गया है। ऐसी स्थिति में एक बार फिर से गांव में सरपंच चुनने के लिए चैपाल पर सारे लोग इक्ट्ठा हुए हैं। यहां सरपंच के साथ-साथ उपसरपंच, पंच और जनपद सदस्य के लिए भी बोली लगाई जाएगी। जनपद सदस्य के पद के लिए किसी प्रत्याशी को एक गांव से चुना जाना संभव नहीं है इसलिए उसकी बोली थोड़ी भिन्न तरह की होगी तथा उसमें सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले व्यक्ति को गांव के सभी लोग वोट करेंगे। बाकि की बोली उनके गांव में ही संपन्न हो जाएगी तथा उसमें सबसे ज्यादा बोली लगाने वाला व्यक्ति सरपंच, उपसरपंच और वार्ड पंच चुना जाएगा।

सरपंच के लिए पांच साल पहले साढ़े तीन लाख की बोली लगी थी इसलिए सबको पता है कि इस बार बोली उससे ज्यादा में ही छूटेगी, लेकिन कितना इसका पता किसी को भी पता नहीं है। बोली प्रारंभ होती है, बोली लगाने के लिए लोग धीरे-धीरे सामने आने लगते हैं। इस बोली के माध्यम से गांव में एक अच्छी खासी आय हो जाएगी जिसका उपयोग अंतराष्ट्रीय रामसनेही संप्रदाय के रामद्वारा निर्माण के लिए दे दी जाएगी। गांव के लोगों को लगता है कि अच्छा रामद्वारा बनेगा तो गांव में बाहर से लोग भी आयेंगे तथा उनके गांव के लोगों की भी तारीफ होगी। सरपंच पद के लिए बोली धीरे-धीरे बढ़ रही है तथा आंकड़ा पांच लाख को पार कर गया है। कुछ लोग बोली लगाना छोड़ चुके हैं तो कुछ अभी भी सरपंच बनने का ख्वाब संजोए बोली लगाए जा रहे हैं। साढ़े पांच लाख, छः लाख, साढ़े छः लाख, सात लाख, साढ़े सात लाख, आठ लाख। आठ लाख एक, आठ लाख दो, आठ लाख तीन ....। सबसे ज्यादा आठ लाख की बोली गांव के दुलेसिंह पिता गोकुल सिंह ने लगाई है। अब सुवासरा तहसील के ढाबला महेश गांव में सरपंच पद के लिए आठ लाख रूपए लगाकर दूलेसिंह पिता गोकुल सिंह इस गांव के सरपंच चुने गए। चैपाल में बैठे प्रतिनिधियों ने आठ लाख रूपए में दुलेसिंह के सरपंच बनने की घोषणा की और उसके बाद दुलेसिंह को बधाई देने वालों का तांता लग गया। अभी सरपंच के लिए मध्यप्रदेश के दूसरे गांवों में नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू नहीं हो पाई है लेकिन इस गांव के लोगों ने बकायदा अपना सरपंच चुन लिया है। अब इस गांव से एकमात्र दुलेसिंह ही अपना नामांकन जमा करेगा तथा वही इस गांव का सरपंच चुना जाएगा। ढाबला महेश का नया सरपंच दुलेसिंह।

इसी तरह से गांव में अन्य पदों के लिए भी बोलियां लगाई गई। लेकिन अन्य पदों केलिए वैसी उत्सुकता और वैसी गहमा-गहमी नहीं देखी गई तथा अन्य सभी पदों को लेकर राशि दो लाख रूपए नहीं पंहुचा। उपसरपंच के पद के लिए 21 हजार रुपए तक ही बोली पंहुच पाई और गांव के मानसिंह अमरसिंह उपसरंपच चुने गए। वहीं प्रत्यके वार्ड के लिए दो-दो हजार रूपए तय किए गए तो वहीं जनपद सदस्य के लिए 26 हजार रूपए की बोली लगी। ग्रामीणों का कहना है कि ईमानदारी से पूरी राशि ग्राम धलपट में रामद्वारा निर्माण में लगाई जा रही है। लगभग 2500 की आबादी वाले सुवासरा तहसील के ग्राम ढाबला महेश में दुलेसिंह पिता गोकुलसिंह ने सर्वाधिक 8 लाख रुपए की बोली लगाकर अगले पांच साल तक सरपंच बनने की उपलब्धि हासिल की।


बोली से तीसरी बार चुना गया सरपंच

ग्राम में यह प्रथा नई नहीं है। सबसे पहले 2005 के चुनाव में भी बोली लगी थी। तब 75 हजार रुपए में बद्रीसिंह गोकुलसिंह सरपंच बने। इसके बाद 2009 में 3.50 लाख रुपए में गीताबाई रामसिंह को सरपंची मिली। वहीं अब यह मौका दुलेसिंह या उनके परिजनों में से एक को मिलेगा। इसके साथ ही उप सरपंच की बोली 21 हजार रुपए में मानसिंह अमरसिंह के खाते में गई। वहीं प्रत्येक वार्ड के पंच भी 2-2 हजार रुपए तय कर दिए गए।

जपं सदस्य ने लगाए 26 हजार रुपए 

यह ग्राम पंचायत सीतामऊ जनपद पंचायत के अंतर्गत आता है जिसका क्षेत्र क्रमांक 18 है। क्षेत्र क्रमांक 18 में इस गांव के साथ-साथ अन्य गांव भी शामिल है इसलिए एक यहीं से जनपद सदस्य चुना जाना संभव नहीं है लेकिन यहां सबसे अधिक राशि देने वाले व्यक्ति के खाते में गांव के सभी वोट जायेंगे इसलिए इस पद हेतु भी बोली लगाई जा रही है। यहां से दावेदार मांगीलाल पिता रतनलाल ने भी ग्राम में सभी मत के लिए 26 हजार रुपए देने की घोषणा की है, इस तरह से सरपंच पद के बाद सबसे अधिक 26 हजार की बोली जनपद सदस्य के लिए दिए जायेंगे। अब इस गांव के सारे वोट थोक में मांगीलाल को मिलने के बाद अन्य प्रत्याशियों के मुकाबले उसकी स्थिति ज्यादा मजबूत है। नीलामी से प्राप्त यह सारी राशि अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के रामद्वारा निर्माण में दी जाएगी।

पहले पैसे, फिर नामांकन


गांव में बोली समाप्त हो चुकी है। अब पहले सरपंच, पंच व अन्य से बोली की राशि ली जाएगी उसके बाद ही उन्हें नामांकन भरने दिया जाएगा। यह राशि रामद्वारा की समिति को दी जाती है।

आपसी प्रेम बना रहेगा

गांव की वर्तमान सरपंच गीताबाई रामसिंह गुर्जर ने बताया कि इसके पीछे हमारी सोच यह है कि गांव में मतदान होगा तो आपसी कटुता भी बढ़ेगी। ऐसे में निर्विरोध निर्वाचन से सबमे प्रेम भी बना रहता है और चुनाव के समय शराब बंटने व अन्य दुष्प्रवृतियों से भी बच जाते हैं। सारा रुपया रामद्वारा निर्माण में लगाते हैं। वहीं भविष्य के लिए गांव के सरपंच चुने जाने वाले दुलेसिंह गोकुलसिंह गुर्जर कहते हैं कि रामद्वारा अच्छा बनेगा तो बाहर के लोग भी आएंगे। हमारे ही गांव का नाम होगा।

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

400 years old village-400 साल पुराना गांव-खुड्डा लाहौरा

चंडीगढ़

कभी 35 घर और आबादी 250 थी...। मतदाताओं की संख्या मात्र 180...। समय के साथ-साथ गांव खुड्डा लाहौरा में अमूल चूल बदलाव आए। आज यहां की जनसंख्या करीब 15 हजार है। साथ ही लोगों ने अपने जरूरत की सभी सुविधाएं भी जुटा ली है। 

इसको पंजाब के तपा मंडी (संगरूर) के धालीवाल परिवार और गांव बिरपणा (संगरूर) के धालीवालों के रिश्तेदार सराओ के परिवार ने इस गांव को बसाया था। इसके अलावा मोहाली के सहोता, गांव खेड़ा (फतेहगढ़ साहिब) के कट्टू, गांव चैदां (संगरूर), गांव नंगला (लुधियाना), के नारद और पिंड रल्ला जोगा (मानसा) के चाहल भाईचारे ने बांधा था। 

इस गांव के मान गोत के इकलौते परिवार के मुखिया मनमोहन सिंह करीब एक दशक ये सरपंच रह चुके हैं। वर्तमान में पूरन चंद के पोते राकेश शर्मा सरपंच हैं। इससे पहले राकेश शर्मा की मां सरपंच रह चुकी हैं। लोगों का मानना है कि गांव का इतिहास करीब चार सौ साल का है। आज भी गांव की शान हरिबाबा का स्थान और पुराना पीपल का पेड़ है।

गेहूं और धान की होती है फसल

इस गांव का रकबा 750 एकड़ है। कभी यहां पर कनक, धान, मक्की, मूंगफली, गन्ना, तिल, चना आदि फसल खूब होती थी। अब केवल गेहूं और धान की खेती के अलावा पशुओं के चारे की खेती होती है। यहां के लोग नीलगाय और जंगली सूअर से परेशान है। ये फसलों को तबाह कर रहे हैं।

1901 में बना था लोअर मिडिल स्कूल

इस गांव में वर्ष 1901 में बना लोअर मिडिल स्कूल के पहले विद्यार्थी इस गांव के सरपंच राकेश शर्मा के दादा पूरन चंद थे। अब यह स्कूल अपग्रेड होकर सीनियर सेकेंडरी हो गया है। गांव में भाईचारा कायम रहे इसके लिए अलग-अलग कुआं थे। गांव के पास अभी भी करीब 450 एकड़ जमीन बची है। पहले इस गांव के साथ लगते गांव खुड्डा जस्सू के साथ पंचायत थी। 1973 में गांव की अलग पंचायत बनी।

अब यह है हाल
गांव की जनसंख्या---15000
मकान-----------4000
वोटर-------3500

यह हैं सुविधाएं

गांव में अच्छा पार्क, पीने का पानी, सीवर सिस्टम, स्टार्म वाटर की बेहतर व्यवस्था है। गलिया पक्की, फिरनी के चारों ओर पेवर ब्लॉक लगे हैं। डबल स्टोरी धर्मशाला। वेटनरी सब सेंटर, हेल्थ सेंटर, सीनियर सेकेंडरी स्कूल की व्यवस्था है। साथ ही गांव में तीन मंदिर, एक गुरुद्वारा, एक गुग्गामाड़ी मंदिर के अलावा हरिपुर वाले बाबा का स्थान भी है।

ये हैं लोगों की मांगे

गांव में खेल का मैदान और स्टेडियम नहीं है। धार्मिक सामाजिक कार्यक्रम के लिए कम्युनिटी सेंटर, बस स्टाप पर शेल्टर बने, गंदे नाले को पक्का किया जाए। गांव के विद्यार्थियों को पढ़ाई और नौकरी में स्पेशल कोटा दिया जाए।

ये है विरासत

जब गांव बसा था उस समय का एक पुराना कुआं है। इसमें पानी नहीं है। पेंट कर और टाइल लगाकर इसे संजोकर रखा गया है। गांव के लोग इसे पूजा के लिए और यादगार के रूप में संजोए हैं।

एक सरपंच जो बन गया मुख्यमंत्री

विलासराव महाराष्ट्र के लोकप्रिय नेताओं में से एक थे। वे दो बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत लातूर जिले के बाभालगांव के सरपंच के रूप में की थी और आज उनकी कामयाबी से सभी वाकिफ हैं। उल्लेखनीय है कि विलासराव ने ही महाराष्ट्र को विकास की नई रफ्तार दी थी। शरद पवार के बाद विलासराव ऐसे पहले नेता थे जिनके नेतृत्व में सबसे अधिक उद्योग महाराष्ट्र में लगे। उनका निधन 14 अगस्त को गुर्दे और लीवर फेल होने की वजह से चेन्नई के एक अस्पताल में हो गया था। विलासराव के परिवार में उनकी पत्नी वैशाली, तीन बेटे अमित, रितेश और धीरज हैं। अमित सभी भाइयों में सबसे बड़े हैं और वर्तमान में महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं।  वहीं रितेश बॉलीवुड अभिनेता हैं और उनकी पत्नी जेनेलिया डिसूजा भी बॉलीवुड अभिनेत्री हैं। 

कैसा रहा राजनीतिक जीवन 

विलासराव देशमुख ने एक सरपंच के रूप में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। वे सर्वप्रथम महाराष्ट्र के लातूर जिले के बाभलगांव ग्राम पंचायत के सरपंच के रूप में चुने गए थे। सन 1974 से लेकर 1976 के दौरान वे सरपंच पद पर रहे। इस कामयाबी के बाद देशमुख उस्मानाबाद जिला पंचायत के सदस्य चुने गए। यहां अपना दबदबा कायम करने के बाद उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा के लिए टिकट मिली और वे भारी बहुमत से विजयी हुए।  

विधानसभा में चुने जाने के बाद वे कई विभागों के मंत्री रहे। विलासराव देशमुख सन 1999 में वे पहली बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने अपना दूसरा कार्यकाल वर्ष 2008 में पूरा किया। वर्ष 2009 से वर्ष 2011 के दौरान वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। इसके बाद उन्होंने केंद्र में भारी उद्योग मंत्रालय तथा ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालयों का जिम्मा भी संभाला। इसके बाद उन्होंने विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला।

Sweep the Sarpanch-झाड़ू वाली सरपंच

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा दो अक्टूबर गांधी जयंती के दिन को सफाई दिवस के रूप में मनाने के फैसले के बाद अच्छे-अच्छों के हाथों में झाडू आ गया है लेकिन यह स्थिति साल में सिर्फ एक दिन ही देखने को मिली है, लेकिन इन सबसे भी बहुत पहले से उसने अपने हाथों में झाडू थाम लिया है। कहने को तो वो सरपंच है लेकिन आज भी वह गांव की गलियों में झाड़ू लगाती है, उसका मानना है कि सरपंच पद दो बस चार दिन की है, आज है पर क्या पता कल रहे या न रहे। फिर अपना काम करने से गुरेज कैसा। इसलिए यदि हम उसे झाड़ूवाली सरपंच भी कह सकते हैं। प्रस्तुत है ‘‘झाडूवाली सरपंच’’ पर मध्यप्रदेश के भिंड से अब्दुल शरीफ की यह खास पड़ताल।

गांव के लोग दलित महिला सरपंच के जज्बे को सलाम करते हैं। सरपंच होने के बाद भी वह गांव की गलियां झाड़ू लगाकर चमाचम रखती है। लोगों ने मना किया तो बोली, ए सरपंची तो पांच साल की है इसके बाद तो झाड़ू ही लगानी है। वैसे भी हमारे काम करने से अन्य लोग भी काम करते हैं और गांव साफ रहता है।

चार साल पहले ग्राम पंचायत पांडरी की सरपंच बनीं आशादेवी ने ईमानदारी की मिसाल पेश करते हुए पंचायत निधि से दो करोड़ के विकास कार्य कराए हैं। लेकिन खुद आज भी सामान्य घर में ही रह रही हैं। आशादेवी ने कहा हम अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ सकते। यही काम करके हमने अपने बच्चों को पाला पोसा और उनको पढ़ा.लिखा रहे हैं। गांव में झाड़ू लगाने व त्रयोदशी एवं वैवाहिक कार्यक्रमों में पत्तलें उठाकर इतना तो मिल जाता है कि उससे परिवार भी पलता है और बाल बच्चों की शादियां भी आसानी से निपट जाती हैं। शासन द्वारा हर माह मानदेय के रूप में मिलने वाले 1750 रूपए से वह संतुष्ट हैं। पति राजाराम उर्फ घोंचे श्वास रोग से पीडित हैं। ऐसे में छह बेटे और चार बेटियां का जिम्मा आशादेवी पर ही है। सरपंच तीन बेटियों और तीन बेटों की शादी भी कर चुकी हैं। जिनमें से एक पुत्रवधू का करीब 11 साल का बेटा भी है।  

चार साल में कराए दो करोड़ के विकास कार्य
करीब सात हजार की आबादी वाले गांव पांडरी की सरपंच आशा देवी ने अपने चार वर्ष के कार्यकाल में 10 सीसी रोड निर्माण, 07 हैंडपंप, एक पुलिया, 14 मेढ़ बंधान, एक प्राथमिक विद्यालय भवन, 35 शौचालय, 20 हितग्राहियों को शौचालय के लिए प्रोत्साहन राशि दी, 18 गृह राज्य आवास, 07 इंदिरा आवास, 60 मुख्यमंत्री आवास स्वीकृत करवाकर बनवाए हैं। कुल मिलाकर लगभग दो करोड़ रूपए की लागत के निर्माण एवं विकास कार्य करवाए जा चुके हैं जबकि कार्यकाल पूरा होने में अभी एक वर्ष बाकी है। इस एक वर्ष में भी उसे अपने गांव के लिए बहुत कुछ करवाना है।

अपने काम में काहे की शर्म
आशादेवी को गांव के लोग झाड़ू लगाते या जूठी पत्तलें उठाते हुए देखकर लोग कहते हैं कि सरपंच होकर ऐसा क्यों कर रही हो तो उनका जवाब होता है अपने काम में काहे की शर्म। सरपंची तो सिर्फ पांच साल की है।  इसके लिए हम अपना पुश्तैनी काम क्यों छोड़ें। आज जब लोग छोटा सा भी कोई पद पाने के बाद बदल जाते हैं, सरपंच बनने के चार साल बाद भी आशा देवी वही पुरानी आशा है जो कि सरपंच बनने से पहले थी, सरपंच बनने के पहले से जो काम वह करते आ रही थी, सरपंच बनने के बाद भी वह अपने उसी पुश्तैनी काम में मशगूल नजर आती है। आशादेवी के बारे में उसके सहयोगी ग्राम पंचायत पांडरी के सचिव अनिल तिवारी बताते हैं कि आशादेवी के चार वर्ष के कार्यकाल में करीब दो करोड़ के विकास एवं निर्माण कार्य हो चुके हैं। सरपंच होते हुए भी उन्होंने मजदूरी करना नहीं छोड़ा। ऐसे कर्मप्रिय सरपंच को पंचायत की मुस्कान परिवार नमन करता है।

Growth story-Chetar-जहां सभी साक्षर

राजेश पटेल

झारखण्ड का एक गांव, शिक्षा और रहन सहन के मामले में जो है शहरों से भी बेहतर। इस गांव के इतने चर्चे कि उसे देखने के लिए राजधानी रांची से लेकर लंदन तक से लोग आ चुके हैं। इस गांव में आखिर ऐसा क्या है कि इस गांव को देखने विदेशियों को भी आना पड़ा, जानिए इस खास रिपोर्ट में।

छत्तीसगढ़ के साथ-साथ जो दो अन्य राज्य अस्तित्व में आए उसमें एक उत्तराखण्ड है और दूसरा झारखंड। देश के तीन बड़े राज्यों उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार का विभाजन कर इन राज्यों का गठन किया गया था। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ की सीमा आपस में लगी हुई है और रहन-सहन से लेकर इन दोनों प्रदेशों के गांवों में काफी कुछ समानता देखने को मिलती है। एक और बात जो दोनों प्रदेशों को समान बनाती है वह यह कि गठन के बाद से दोनों ही प्रदेश एक ही प्रकार के नक्सल चुनौतियों से दो-चार हो रहे हैं। इसी झारखंड के रामगढ़ जिला स्थित चेटर गांव के लोगों ने खुद के प्रयासों से आदर्श पेश किया है। 15 अगस्त 1947 को हमारा देश आजाद हुआ और इन 67 सालों में किसी अपराधी को पकड़ने के नाम से आज तक पुलिस नहीं पंहुची। आजादी के बाद से गांव का कोई भी मामला थाने तक नहीं पहुंचा। इस गांव की एक और विशेषता, इस गांव के सभी लोग पढ़े लिखे हैं। शत-प्रतिशत साक्षरता वाले इस गांव की आबादी करीब एक हजार है जिनमें 35 लोग शिक्षक हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस गांव में कभी कोई विवाद नहीं होता। इस गांव में भी छोटे मोटे विवाद होते रहते हैं लेकिन गांव में किसी विवाद की स्थिति में मामला पुलिस के पास जाने के बजाए पंचायत में ही सर्वसम्मति से सुलझा लिया जाता है तथा जरूरत पड़ी तो दोषी को जुर्माना लगाकर दण्डित किया जाता है। दोषी पर लगाए गए अर्थदंड को भी गांव के किसी सार्वजनिक कार्य अथवा निर्धन की सहायता में खर्च किया जाता है। इस गांव के लोगों की सरलता, सहजता और सादगी की चर्चा प्रदेश की राजधानी से लेकर सात समुंदर पार तक जा चुकी है। ग्रामीणों की माने तो उनका रहन-सहन देखने रांची के संत जेवियर कॉलेज के छात्र से लेकर लंदन से भी लोग आ चुके हैं।

रामगढ़ जिला मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर इस गांव की तरक्की देखते ही बनती है। गांवों की संकरी गलियों के विपरीत यहां की गलियां इतनी चैड़ी की हर गली में चार पहिया वाहन आसानी से आ-जा सकता है। यहां गंदगी और गंदे पानी को तो जैसे ढूंढते रह जाओगे। गांव में कहीं पर भी गंदा पानी नहीं दिखता और गांव की सभी नालियां अंडरग्राउंड हैं। गलियों की साफ-सफाई गांव के ही युवक टोली बनाकर करते हैं। मौका खुशी का हो या किसी के गम का, गांव का कोई भी नागरिक नशे में नहीं दिखता। कोठार पंचायत के इस गांव में महतो, मुंडा, बेदिया, करमाली, मुसलमान, ठाकुर (नाई) तथा कुम्हार जाति के लोग रहते हैं लेकिन इनकी एकता देखकर लगता है कि पूरा गांव एक ही परिवार है। 80 वर्षीय तुलाराम महतो बताते हैं कि वे लोग आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाते थे लेकिन आजादी के बाद से यहां का कोई मामला पुलिस तक नहीं पहुंचा। गांव में कोई विवाद हो भी जाता है तो उस विवाद को निपटाने के लिए सर्वसम्मति से पंच चुने जाते हैं, जिनका फैसला सभी को मान्य होता है। अर्थदंड की राशि दो लोगों के नाम से खुले खाते में रखी जाती है। जिसे किसी गरीब की बेटी की शादी में या सार्वजनिक कार्य में खर्च किया जाता है। इलाके के पुलिस अधीक्षक रंजीत कुमार प्रसाद ने कहा कि चेटर गांव के लोग तारीफ के काबिल हैं, जो आपसी विवाद को पंचायत में सुलझा लेते हैं। गांव का अपराध शून्य होना बहुत सराहनीय है।

Growth story-Ramgarh-खुले में कि शौच तो खैर नहीं

रामगढ़। अब चाहे कितनी भी इमरजेंसी हो लेकिन शौच के लिए आपको अपने घर में बने शौचालयों में बैठना पड़ेगा, इस गांव में अगर आप खुले में शौच किए तो आपकी खैर नही। ऐसा करने पर आपको जुर्माना देना पड़ेगा, झारखंड के रामगढ़ जिले की मुर्राम कलां पंचायत की महिलाएं निर्मल भारत अभियान को सफल बनाने के लिए आगे बढ़ी हैं। शुक्रवार 22 अगस्त को स्थानीय पटेल छात्रावास में निर्मल भारत के तहत आयोजित सभा में सैकड़ों महिलाओं ने खुले में शौच न करने की शपथ ली। सभा में सभी को शपथ दिलाई गई कि वे अपने घरों में व्यक्तिगत रूप से शौचालय का निर्माण कराएंगे। अगर कोई खुले में शौच करेगा तो उसे 101 रुपये जुर्माना देना पड़ेगा। पंचायत की युवतियों ने शपथ ली कि जिन घरों में शौचालय नहीं होगा, वहां शादी नहीं करेंगी। इसके अलावा भूमिगत जल संरक्षण को लेकर भी पंचायत में निर्णय लिया गया। इसके तहत हर मकान में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने का फैसला किया और प्रस्ताव भी पारित कर दिया। ग्रामीणों ने स्वच्छ पानी पीने का भी संकल्प लिया। कहा, अगर घर में कुआं हो और पास में हैंडपंप तो हैंडपंप के पानी का ही इस्तेमाल करेंगे। मौके पर मौजूद बीडीओ पवन कुमार महतो, पंचायत प्रमुख माधवी देवी, मुर्राम कलां पंचायत की मुखिया अर्चना महतो ने सभी महिलाओं को शपथ दिलाई।